4 जून 2018

गिरता मकान


सवाल  जवाब  सवाल  जवाब 
आरोप  प्रत्यारोप, भाषण , बयानबाजी 
नए  नए  मुद्दों  पर  होती  बहसें 
धांय धांय धूं धूं  
शब्दों  की  गोलीबारी 
मची  है उठा  पटक 
छींछालेदर 
टीवी  पे  आओ, अख़बार में छाओ, कार्यक्रमों में दिखाओ 
भीड़ में चमको  कुछ  भी  बोल  कर 
सबको  दिखना  है  सबको  बिकना  है 
रंग  बिरंगे  बाजारों  में, बड़े  बड़े  मूल्यों  पर 
ख्याति  की  अनुशंसा  पर 
डराता  है  ये  सन्नाटा  भरा  शोर …………………
मगर फिर भी
कुछ होने न होने, बदलाव और सुधारों
की अनिश्चितता के बीच

नाकारेपन   की  इस  अम्लीय  बारिश  में  
मीठे  पानी  की  बूंदें  घोलते 
कुछ  अनदेखे  चेहरे 
चुपचाप  लगातार  कर  रहे  हैं  अपना काम, बिना  थके 
बस  कहीं  हमारे   ही  बीच  बिना  प्रसिद्धि  की भूख के
सामने नहीं आते पर  
साध  रखीं हैं  घर  की  भंगुर  दीवारें  तुमने 
जहाँ  तहाँ …….
नींव के बचे हुए पत्थर की तरह

-विपिन सिंह                                         

28 फ़रवरी 2018

सवाल उन आँखों का, हमसे

                 

शायद कभी देखा हो तुमने रास्तों पर पीछे मुड़कर
खड़ा होता है कोई मासूम फटे पुराने कपड़ों में लिपटकर......... 
सोता है हर रोज वो इक रात के सन्नाटे में 
हर सुबह उठता है वो गाड़ियों का शोर सुनकर.........
किसी की डांट या फटकार उसे नहीं रुलाती 
रोता है तो बस पेट की भूख से तड़पकर ......  
अपने नन्हे हाथों से आँखों को मलता हुआ 
फिर एक रोटी की तलाश में चलता हुआ 
उसके दिन का सफ़र शुरू हो जाता है और 
हमारे इस विकसित हो रहे समाज में वो नन्हा 
फिर उसी रात के सन्नाटे में भूखे पेट ही सो जाता है..... 
उसकी ख़ामोशी पूछती है जवाब दो उसका 
क्यों उसी की जिन्दगी हिस्सा है इस कशमकश का 
क्यों नहीं  वो खा सकता पहन सकता पढ़ सकता हमारी तरह 
आखिर इस बचपने में अपराध क्या है उसका ........
क्यों रास्तों की धूल उसे नहलाती है
क्यों धुंए की कालिख उसे सजाती है 
क्यों वो किसी के लाड और दुलार का मोहताज है 
कौन देगा जवाब इसका 
आखिर इस बचपने में अपराध क्या है उसका .......आखिर इस बचपने मैं अपराध क्या है उसका.

भूख से तड़पते उस पेट को कभी दो रोटी खिला देना  
फटे कपड़ों में पड़े जिस्म को कभी एक चादर उढ़ा देना.........
रोते बिलखते उन नन्हों को जिनके जल रहे हैं पांव 
दुनिया की इस तपिश में,जिन्दगी भर के लिए ना सही 
कुछ लम्हों के लिए ही अपनी गोद में उठा लेना..........
कुछ और ना कर सको अभी उनके लिए तो ना सही 
प्यार से इक बार उनके सर पे हाथ फिरा देना ..........
क्योंकि ये सब करके - 
शायद ना पोंछ सको उन सभी आँखों के तुम आंसू  
पर नम हुई उन आँखों में कुछ पल ख़ुशी की चमक ला देना....... 
नम हुई उन आँखों में कुछ पल ख़ुशी की चमक ला देना......... 
                                                                                                
                                                                                    


27 फ़रवरी 2017

सागर की व्यथा

दूर उठती है किनारे से 
सागर में कोई शक्तिशाली लहर
न्यूनतम रूप में होती है 
अक्सर किनारे पर,
फिर भी डगमगा गए 
उसके सामने आज मेरे कदम
बहा ले गयी रेत मेरे तलवों के नीचे से 
जैसे गुनगुना गया हो महोदधि 
मेरे कानों में मेरी ही विवशता /
झकझोर दिया था उसके एक 
अंश ने मेरी पूर्णता को 
कितनी दुर्बल थी मेरी सबलता 
भी उसकी निर्बलता के सामने/
सागर, जिसकी अनंतता को 
सिमटा दिया था कवि ने कविता में 
किसी ने प्रियतम की आँखों में
किसी ने अतिश्योक्ति भरी बातों में,
ने पहली बार कही अपनी व्यथा 
या शायद हमारी/
थे पुरुष, जिनके शरों में 
शक्ति थी मुझे सुखाने की 
अंजुल में भरकर पी जाने की 
धाराओं को काटकर प्रशस्त 
मार्ग बनाने की,
किन्तु वे अजेय थे निज पुरुषत्व से
जो खो रहा है तेरे भीतर 
और जीत रहा तू बस शब्दों से//.......

8 दिसंबर 2014

वो आँखें



देखा था उस रोज छुप छुपकर मैंने उन आँखों में 

चंचल हिरणी सी पाक थीं वो आँखें 
गंगा के पानी सी साफ थीं वो आँखें 
सितारों सा नूर था उन आँखों में     
देखा था उस रोज मैंने जिन आँखों में

इक अजीब सा अपनापन था उनमें 
बच्चों सा भोलापन था उनमें
बहुत कोशिश करतीं थी वो छुपाने की
फिर भी सब पढ़ लिया था मैंने उन आँखों में
देखा था उस रोज मैंने जिन आँखों में 

आसमां छू जाने की ललक थी उनमें 
चहचहाती हुई चिड़िया की झलक थी उनमें 
मुरझाये चेहरे पर मुस्कान ला दें 
कुछ ऐसी कसक थी उन आँखों मैं 
हाँ.… कुछ ऎसी कसक थी उन आँखों में..... 

लम्हा लम्हा जब पलकें उन आँखों को ढकती थीं 
लगता था चांदनी पर काली घटा का पहरा हो 
जब कभी वो पलकें हटाती थी उन आँखों से 
मानो जमीं  पर उतरा चाँद सुनहरा हो
इतनी  खुबसूरत थीं वो मगर गुरुर न था उन आँखों में  
देख रहा था चुपके से में  जिन आँखों में.....   

या खुदा उन आँखों को कभी पराया न करना 
उन पर कभी ग़मों का साया न करना
उनकी ख़ुशी की लिए मेरी जिन्दगी भी ले लेना तुम  
मगर उस नूरानी चेहरे को कभी गमजाया न करना.......
क़यामत तक  रहे बरक़रार ख़ुशी उन आँखों मैं
देखा था उस रोज  मैंने जिन आँखों में.... ……
 देखा था उस रोज मैंने जिन आँखों में। .......... \\\\\\\\

11 जनवरी 2014

चुनावी सर्वेक्षणों पर पाबंदी !!!!! आखिर क्यूँ?


               चुनावी सर्वेक्षण के परिणाम चुनाव के नतीजों पर कितना असर डालते हैं ये कहना थोडा मुश्किल है, कई मौकों पर चुनाव के नतीजे इन सर्वेक्षणों के बिलकुल विपरीत रहे हैं तो कई दफा इनके अनुरूप भी/ मगर ये सर्वेक्षण और इनके परिणाम मतदाता का अजेंडा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं खासकर वो मतदाता जो आमतौर सरकार या राजनैतिक गतिविधियों में रुचिं नहीं लेता, इन्हीं सर्वेक्षणों को ही अपने वोट का आधार बना लेता है/ वो सोचता है कि यदि फलां फलां पार्टी इस सर्वेक्षण में विजयी हुई है तो उसमें अवश्य ही कुछ बात होगी/ उसे जनसमर्थन प्राप्त है अत: किसी और को वोट देकर मुझे अपना वोट व्यर्थ नहीं करना चाहिए/ ऐसे तमाम तरह के विचार मतदाता की सोच निर्धारित कर सकते हैं या उसकी दिशा भी बदल सकते हैं/

               इन मनोवैज्ञानिक पक्षों का फायदा उठाया जा सकता है/ कई राजनैतिक दल अपने समर्थकों या समर्थन वाले क्षेत्रों (जिनमें हो सकता है कि कुछ विशेष सामाजिक, आर्थिक, शैक्षिक या धार्मिक पृष्ठभूमि के लोग ही शामिल हों) में सर्वेक्षण कराकर उनके नतीजों को जनता की राय के रूप में प्रचारित करते हैं/ कभी कभी हमारा मीडिया भी पक्षपाती रवैया अपनाते हुए किसी पार्टी या व्यक्ति विशेष को फायदा पहुँचाने के उद्देश्य से ऐसे सर्वेक्षणों को आयोजित करता है/ इस तरह से मतदाता को भ्रमित करने का प्रयास किया जाता है/

                इन नकारात्मक पहलुओं पर विचार करते हुए यदि हम इन चुनावी सर्वेक्षणों पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दें, तो ये एक तीखी सोच का निर्णय कहा जायेगा/ विभिन्न राजनैतिक दलों के या निर्दलीय उम्मीदवार जो जनता के प्रतिनिधि के रूप में इस देश के लोगों के नियामक बनना चाहते हैं, उनके बारे में अपनी पसंद या नापसंद जाहिर करने का हक़ जनता को है/ लोग अपनी राय रखने के लिए पूरी तरह से स्वतंत्र हैं, चाहे वो वोट के रूप में सहमति जताकर हो या फिर इस तरह के सर्वेक्षणों में भाग लेकर/ चुनावी सर्वेक्षणों को प्रतिबंधित कर हम स्वतंत्र अभिव्यक्ति के सिद्धांत को तो कमजोर करेंगे ही, देश में लोगों के बीच संवाद का एक माध्यम भी ख़त्म हो जायेगा/ जब मीडिया निष्पक्ष रूप से कराये गए सर्वेक्षण जनता के सामने रखती है तो उन्हें अन्य लोगों के विचारों को समझने का अवसर मिलता है

               चुनावी सर्वेक्षणों पर प्रतिबन्ध लगाने से बेहतर है हम इनकी निष्पक्षता व पारदर्शिता पर काम करें/ इन सर्वेक्षणों के प्रसारण के सम्बन्ध में कुछ दिशा निर्देश तय किये जा सकते हैं/ जैसे कि चुनावी सर्वेक्षणों के नतीजे दिखाते समय यह भी बताया जाये कि सर्वेक्षण किस क्षेत्र में कराया गया, सर्वेक्षण में कितने लोगों ने भाग लिया, सर्वेक्षण में किस पृष्ठभूमि के लोगों को सम्मिलित किया गया, सर्वेक्षण में पूछे गए मुख्य सवाल क्या थे/ इसके अतिरिक्त नतीजों के साथ कुछ सलाह संदेशों को भी प्रसारित किया जा सकता है उदहारण के तौर पर "ये नतीजे सर्वेक्षण में भाग लेने वाले लोगों कि निजी राय पर आधारित हैं दर्शक अपनी राय अपने विवेक के आधार पर तय करें" / 
               इस तरह के कुछ प्रयासों से हम इन सर्वेक्षणों की स्पष्ट तस्वीर लोगों के सामने रख पाएंगे और मतदाता समाज के अन्य तबकों के विचारों को जानते परखते हुए स्वतंत्र रूप से अपना अजेंडा तय कर सकेंगे/ हालाँकि इस सबके बीच चुनाव आयोग का ये फैसला बिलकुल सही है कि चुनाव के ४८ घंटे पूर्व इन सर्वेक्षणों के नतीजे प्रसारित न किये जाएँ ताकि उस दौरान इन सर्वेक्षणों के माध्यम से किसी भी तरह के पार्टी प्रचार को रोका जा सके/

7 दिसंबर 2013

मंडेला का अवसान : एक युग का समापन

       
      
        शांति और अहिंसा का एक और दिया बुझ गया/ बंधुत्व व भाईचारे के अग्रदूत रोलिहलहला डालीभूंगा मंडेला हमारे बीच नहीं हैं/ दक्षिण अफ्रीका के केप प्रान्त के एक कबीले  में  जन्मे मंडेला ने सारा जीवन रंगभेद व नसलभेद के खिलाफ लड़ने में  बिता दिया/ अपने जीवन के खूबसूरत २७ साल उन्होंने रॉबेन द्वीप की जेल में  यातनाएं भोगते हुए बिताये/ मगर जेल कठिन समय में  भी पत्रों और पुस्तकों के माध्यम से उस आंदोलन को जीवंत बनाये रखा जिसका उद्देश्य श्वेत लोगों के दमन और शोषण से अश्वेत लोगों को मुक्ति दिलाना था/ अंतत: लम्बे संघर्ष के बाद १९९४ में देश के पहले लोकतान्त्रिक चुनाव में वो अफ्रीका के पहले अश्वेत राष्ट्रपति निर्वाचित हुए/
     
        नेल्सन मंडेला ने सिर्फ अश्वेत लोगों को रंगभेद से मुक्त ही नहीं कराया बल्कि देश में  विभिन्न मूल के लोगों को जोड़ कर भी रखा/ श्वेत शासकों द्वारा जेल में यातनाएं देने के बावजूद वो किसी भी तरह की कटुता से अछूते रहे/ उनका आंदोलन कभी भी श्वेत लोगों के खिलाफ नहीं बल्कि उनकी नीतियों के विरोध में था/ मंडेला एक सौम्य और करिश्मायी व्यक्तित्व के धनी थे/ उनकी पहचान राजनेता से कहीं ज्यादा एक नैतिक नेता के रूप में रहेगी/ हमारे और दक्षिण अफ्रीका के लोगों के लिए उन्होंने जो विरासत छोड़ी है वो यही बयां करती है कि बिना किसी भेदभाव के मिल जुल कर रहें,/ यही उस शांतिदूत को हमारी सच्ची श्रद्धांजली होगी/ 

3 अक्टूबर 2013

सुरक्षा के नाम पर सेंध

         
          सीआईए अधिकारी, स्नोडेन ने अमेरिका द्वारा अन्य देशों की जासूसी कराये जाने से संबंधित जो खुलासे किये हैं उस पर विश्व भर से तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आयीं हैं/ जिसे अमेरिका सुरक्षा के लिए जरुरी प्रक्रिया के रूप में भुनाने पर जुटा है वो दरसल उसकी सीमाओं का अतिक्रमण है/ आज लगभग सारा विश्व आतंकवाद के बिच्छू का दंश झेल रहा है/ देश की अंदरूनी गतिविधियों के साथ साथ विश्व भर की संदिग्ध घटनाओं पर नजर रखना जरुरी हो गया है/ यूँ तो हर एक देश की गुप्तचर एजेंसियां अन्य देशों में हो रही अस्वाभाविक घटनाओं की जानकारी रखती ही हैं/ मगर इसकी आढ़ में जिम्मेदार देशों के राजनयिकों के फ़ोन टेप करना, देशों के पत्र व्यवहार पर नजर रखना, उनके दस्तावेजों की गुपचुप जासूसी स्वीकार्य नहीं है/ अमेरिका ने इस मामले में अपने अधिकार क्षेत्रों का उल्लंघन किया है/
          ओबामा जी ने कहा कि हमारे खुफिया अधिकारियों की रूचि आपके व्यक्तिगत पत्र, व्यक्तिगत फ़ोन टेप करने में नहीं है, मगर ओबामा जी, हमारे राजनयिकों के बीच होने वाले आपसी वार्तालाप व सूचना का आदान प्रदान भी आपके अधिकार क्षेत्र में नहीं आते/ सुरक्षा के नाम पर अमेरिकी एजेंसियां जिस तरह अन्य देशों के हर एक कामकाज की जानकारी जुटा रहीं हैं उसका सीधा उपयोग आर्थिक, सामरिक व व्यापारिक क्षेत्र में खुद को प्रतिस्पर्धी व मजबूत करने में किया जा सकता है/ क्यूंकि यहाँ आप हर देश की किसी भी नीति, योजना व कार्यक्रम पर अवैध तरीके से नजर गढ़ाए बैठे हैं/ इस तरह की सेंध अंतर्राष्ट्रीय समुदाए में सिर्फ अविश्वास ही पैदा करेगी और साथ ही आपकी मंशा पर भी सवाल उठेंगे/ 
           भारत भी उसकी जासूसी की जद में है और ये भारत की सुरक्षा के लिहाज से खतरा है, फिर चाहे वो आर्थिक हो , सामरिक या फिर व्यापारिक/ अगर आपके घरेलु कामकाज, आपके अंदरूनी वार्तालाप, आपके शासकीय पत्राचार, दस्तावेजों के आदान प्रदान पर जासूसी निगाह गढ़ी हुई है तो आप पूर्ण सुरक्षित होने का दम नहीं भर सकते/ भारत को बिना किसी लागलपेट के अमेरिका से सीधा स्पष्टीकरण मांगना चाहिए कि क्यूँ उसने भारत की संप्रभुता, और निजता को नुकसान पहुँचाया/ अपनी सुरक्षा के नाम पर एक शांतिपूर्ण, स्वतंत्र, और सम्प्रभु राष्ट्र की निगरानी करने का अधिकार उसे किसने दिया/ अमेरिका भारत को विश्वास दिलाये कि भविष्य में इस तरह की घटनाओं की पुनरावृत्ति नहीं होगी/ भारत वैश्विक मंच पर एक जिम्मेदार राष्ट्र है और आतंकवाद के खिलाफ हर तरह से प्रतिबद्ध है मगर इस तरह उसकी जासूसी उसे कतई स्वीकार्य नहीं है/
 

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