27 फ़रवरी 2017

सागर की व्यथा

दूर उठती है किनारे से 
सागर में कोई शक्तिशाली लहर
न्यूनतम रूप में होती है 
अक्सर किनारे पर,
फिर भी डगमगा गए 
उसके सामने आज मेरे कदम
बहा ले गयी रेत मेरे तलवों के नीचे से 
जैसे गुनगुना गया हो महोदधि 
मेरे कानों में मेरी ही विवशता /
झकझोर दिया था उसके एक 
अंश ने मेरी पूर्णता को 
कितनी दुर्बल थी मेरी सबलता 
भी उसकी निर्बलता के सामने/
सागर, जिसकी अनंतता को 
सिमटा दिया था कवि ने कविता में 
किसी ने प्रियतम की आँखों में
किसी ने अतिश्योक्ति भरी बातों में,
ने पहली बार कही अपनी व्यथा 
या शायद हमारी/
थे पुरुष, जिनके शरों में 
शक्ति थी मुझे सुखाने की 
अंजुल में भरकर पी जाने की 
धाराओं को काटकर प्रशस्त 
मार्ग बनाने की,
किन्तु वे अजेय थे निज पुरुषत्व से
जो खो रहा है तेरे भीतर 
और जीत रहा तू बस शब्दों से//.......

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