8 दिसंबर 2014

वो आँखें



देखा था उस रोज छुप छुपकर मैंने उन आँखों में 

चंचल हिरणी सी पाक थीं वो आँखें 
गंगा के पानी सी साफ थीं वो आँखें 
सितारों सा नूर था उन आँखों में     
देखा था उस रोज मैंने जिन आँखों में

इक अजीब सा अपनापन था उनमें 
बच्चों सा भोलापन था उनमें
बहुत कोशिश करतीं थी वो छुपाने की
फिर भी सब पढ़ लिया था मैंने उन आँखों में
देखा था उस रोज मैंने जिन आँखों में 

आसमां छू जाने की ललक थी उनमें 
चहचहाती हुई चिड़िया की झलक थी उनमें 
मुरझाये चेहरे पर मुस्कान ला दें 
कुछ ऐसी कसक थी उन आँखों मैं 
हाँ.… कुछ ऎसी कसक थी उन आँखों में..... 

लम्हा लम्हा जब पलकें उन आँखों को ढकती थीं 
लगता था चांदनी पर काली घटा का पहरा हो 
जब कभी वो पलकें हटाती थी उन आँखों से 
मानो जमीं  पर उतरा चाँद सुनहरा हो
इतनी  खुबसूरत थीं वो मगर गुरुर न था उन आँखों में  
देख रहा था चुपके से में  जिन आँखों में.....   

या खुदा उन आँखों को कभी पराया न करना 
उन पर कभी ग़मों का साया न करना
उनकी ख़ुशी की लिए मेरी जिन्दगी भी ले लेना तुम  
मगर उस नूरानी चेहरे को कभी गमजाया न करना.......
क़यामत तक  रहे बरक़रार ख़ुशी उन आँखों मैं
देखा था उस रोज  मैंने जिन आँखों में.... ……
 देखा था उस रोज मैंने जिन आँखों में। .......... \\\\\\\\

 

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