चंचल हिरणी सी पाक थीं वो आँखें
गंगा के पानी सी साफ थीं वो आँखें
सितारों सा नूर था उन आँखों में
देखा था उस रोज मैंने जिन आँखों में
इक अजीब सा अपनापन था उनमें
बच्चों सा भोलापन था उनमें
बहुत कोशिश करतीं थी वो छुपाने की
फिर भी सब पढ़ लिया था मैंने उन आँखों में
देखा था उस रोज मैंने जिन आँखों में
आसमां छू जाने की ललक थी उनमें
चहचहाती हुई चिड़िया की झलक थी उनमें
मुरझाये चेहरे पर मुस्कान ला दें
कुछ ऐसी कसक थी उन आँखों मैं
हाँ.… कुछ ऎसी कसक थी उन आँखों में.....
लम्हा लम्हा जब पलकें उन आँखों को ढकती थीं
लगता था चांदनी पर काली घटा का पहरा हो
जब कभी वो पलकें हटाती थी उन आँखों से
मानो जमीं पर उतरा चाँद सुनहरा हो
इतनी खुबसूरत थीं वो मगर गुरुर न था उन आँखों में
देख रहा था चुपके से में जिन आँखों में.....
या खुदा उन आँखों को कभी पराया न करना
उन पर कभी ग़मों का साया न करना
उनकी ख़ुशी की लिए मेरी जिन्दगी भी ले लेना तुम
मगर उस नूरानी चेहरे को कभी गमजाया न करना.......
क़यामत तक रहे बरक़रार ख़ुशी उन आँखों मैं
देखा था उस रोज मैंने जिन आँखों में.... ……
देखा था उस रोज मैंने जिन आँखों में। .......... \\\\\\\\

