28 फ़रवरी 2018

सवाल उन आँखों का, हमसे

                 

शायद कभी देखा हो तुमने रास्तों पर पीछे मुड़कर
खड़ा होता है कोई मासूम फटे पुराने कपड़ों में लिपटकर......... 
सोता है हर रोज वो इक रात के सन्नाटे में 
हर सुबह उठता है वो गाड़ियों का शोर सुनकर.........
किसी की डांट या फटकार उसे नहीं रुलाती 
रोता है तो बस पेट की भूख से तड़पकर ......  
अपने नन्हे हाथों से आँखों को मलता हुआ 
फिर एक रोटी की तलाश में चलता हुआ 
उसके दिन का सफ़र शुरू हो जाता है और 
हमारे इस विकसित हो रहे समाज में वो नन्हा 
फिर उसी रात के सन्नाटे में भूखे पेट ही सो जाता है..... 
उसकी ख़ामोशी पूछती है जवाब दो उसका 
क्यों उसी की जिन्दगी हिस्सा है इस कशमकश का 
क्यों नहीं  वो खा सकता पहन सकता पढ़ सकता हमारी तरह 
आखिर इस बचपने में अपराध क्या है उसका ........
क्यों रास्तों की धूल उसे नहलाती है
क्यों धुंए की कालिख उसे सजाती है 
क्यों वो किसी के लाड और दुलार का मोहताज है 
कौन देगा जवाब इसका 
आखिर इस बचपने में अपराध क्या है उसका .......आखिर इस बचपने मैं अपराध क्या है उसका.

भूख से तड़पते उस पेट को कभी दो रोटी खिला देना  
फटे कपड़ों में पड़े जिस्म को कभी एक चादर उढ़ा देना.........
रोते बिलखते उन नन्हों को जिनके जल रहे हैं पांव 
दुनिया की इस तपिश में,जिन्दगी भर के लिए ना सही 
कुछ लम्हों के लिए ही अपनी गोद में उठा लेना..........
कुछ और ना कर सको अभी उनके लिए तो ना सही 
प्यार से इक बार उनके सर पे हाथ फिरा देना ..........
क्योंकि ये सब करके - 
शायद ना पोंछ सको उन सभी आँखों के तुम आंसू  
पर नम हुई उन आँखों में कुछ पल ख़ुशी की चमक ला देना....... 
नम हुई उन आँखों में कुछ पल ख़ुशी की चमक ला देना......... 
                                                                                                
                                                                                    


 

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