29 अगस्त 2013

नेताजी की मटकी

आज-
गाँव से इक और त्यौहार का हरण
शहर के चौराहे पर सरेआम
अब मटकी का राजनीतिकरण
दो कोस की सड़क, आठ झांकी आयोजित
सारी की सारी बाहुबली प्रायोजित
चंदा के नाम पर हप्ता वसूली
मटकी थी या शायद
किसी की मेहनत की सूली
निर्बल रुपये की झालर सजी
बूढी अम्मा सी क्रेन, मटकी लिए खडी
पलना कहीं खोपचे में छुपा
मंच पे नेताजी का सिंहासन लगा.....

उमंग के नाम हुडदंग हुआ
वर्चस्व दिखाने कृष्ण जन्म का स्वांग हुआ
प्रसाद कहाँ, होड़ मची, बख्शीश बंटी
कुछ नन्हे नन्हे ग्वालों की उम्र घटी….

जन डूबे माँ मुन्नी, शीला  के भजनों में
कुछ मग्न हो चले अतिथि के सपनों में
कहीं बिपाशा, कहीं कंगना, मलाइका के
स्वागत की तैयारी
भटक रहे थे जगह ढूंढते
दर दर कृष्ण मुरारी………
                                                              

15 अगस्त 2013

इस बरस, स्वाधीनता दिवस


स्वाधीनता दिवस की तैयारी चल रही है
ध्वज संदूक से निकला है, उसकी धुलाई चल रही है
मानते हैं, थोडा सत्ता के कीचड़ में सना है
मुंह के बल पड़ी अर्थव्यवस्था से दबा है
कहीं कहीं छींटे हैं स्वार्थ की लार के
सड़कों पर फैलती धार्मिक टार के
चरमरायी नीतियों की सलवटें पडीं हैं
संवैधानिक प्रष्ठों की लुगदी भी चढी है
हरे रंग की चमक दिखती ही नहीं
कोयले सी कालिख हटती ही नहीं
केसरिया धुंधला गया है
शहादत पे राजनीति का बादल छा गया है
खैर, कौन सा इसे साल भर लहरना है
बस कल ही तो फहरना है
इसीलिए लाल किले की रंगाई चल रही है
ध्वज संदूक से निकला है, उसकी धुलाई चल रही है /

13 अगस्त 2013

प्रथम परिपत्र

एक लम्बे कुम्भकर्णी विश्राम के बाद आखिरकार ये ब्लॉग फिर से खुल गया वैसे इसके विश्राम में हमारे आलस का बढ़ा योगदान है/ नई शुरुआत के लिए बीते सप्ताह इसके विन्यास में बहुत सर खपाया/ दरअसल, नक्श पर काम करते करते हम ब्लॉगर की तकनीकी गहराई में चले गए थे, पर जल्द ही अपनी मर्यादाओं को समझते हुए चुपचाप गूगल बाबा का सहारा ले लिया/ नया लिखने के लिए पुराना हटा दिया है/ अब अपनी कवितायेँ झिलाने के साथ साथ कुछ और भी लिखेंगे, उम्मीद है इस बार निरंतरता रहेगी/ शेष भविष्य के गर्भ में..... 
 

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