स्वाधीनता दिवस की तैयारी चल रही है
ध्वज संदूक से निकला है, उसकी धुलाई चल रही है
मानते हैं, थोडा सत्ता के कीचड़ में सना है
मुंह के बल पड़ी अर्थव्यवस्था से दबा है
कहीं कहीं छींटे हैं स्वार्थ की लार के
सड़कों पर फैलती धार्मिक टार के
चरमरायी नीतियों की सलवटें पडीं हैं
संवैधानिक प्रष्ठों की लुगदी भी चढी है
हरे रंग की चमक दिखती ही नहीं
कोयले सी कालिख हटती ही नहीं
केसरिया धुंधला गया है
शहादत पे राजनीति का बादल छा गया है
खैर, कौन सा इसे साल भर लहरना है
बस कल ही तो फहरना है
इसीलिए लाल किले की रंगाई चल रही है
ध्वज संदूक से निकला है, उसकी धुलाई चल रही है /

0 comments:
एक टिप्पणी भेजें